सुप्रिम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद पुलिस थानों में जप्त संपत्ति का निराकरण नहीं

सुप्रिम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद पुलिस थानों में जप्त संपत्ति का निराकरण नहीं

अभियोजन की उदासीनता से जप्त सम्पत्ति की निलामी नहीं       
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बैतूल  [टी ओ सी न्यूज़ ] उच्चातम न्यायालय द्वारा सुन्दरभाई अंबालाल देसाई व अन्य विरूद्ध गुजरात रा'य एआईआर 2003 सु0को0 638 के मामले में दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 व 457 की व्याख्या करते करते हुए भारत संघ के अधीन समस्त रा'य सरकारों को पुलिस थानों में जप्त सम्पत्ति का निराकरण करने के व्यापक दिशा निर्देश दिया गया हैं तथा संबंधित रा'य की हाई कोर्ट रजिस्ट्री को निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा गया हैं। सुप्रिम कोर्ट के निर्देशो में विचारण न्यायालय, अभियोजन और पुलिस की भूमिका जप्त संपत्ति के समय सीमा में निराकरण की वैधानिक जिम्मेदारी तय की गई हैं। जनहित याचिका पर वर्ष 2003 में दिए गए इन निर्देशो की उपेक्षा के चलते मप्र रा'य के समस्त पुलिस थाने करोड़ो रूपये मूल्य की जप्त संपत्ति के कारण बड़ेकबाडख़ानो में परिवर्तित होते चले जा रहे हैं जबकि मप्र शासन को जप्त संपत्ति की समयबद्ध निलामी से करोड़ो का राजस्व प्राप्त हो सकता हैं।

        सुप्रिम कोर्ट द्वारा संहिता की धारा 451 के प्रायोजन की व्याख्या करते हुए कहा गया हैं कि संहिता की धारा 451 की शक्तियों का प्रयोग शीध्रता से व न्यायिक तौर पर किया जाना चाहिए। ऐसा किए जाने पर विभिन्न प्रयोजन हल होंगे अर्थात्-

1. वस्तु के स्वामी को पीडि़त नहीं होना पड़ेगा क्योंकि सम्पत्ति अनुपयोग की स्थिति में नहीं रहेंगी।
2. न्यायालय अथवा पुलिस को वस्तु को सुरक्षित अभिरक्षा में नहीं रखना पड़ेगा।
3. यदि वस्तु का आधिपत्य सौंपे जाने के पूर्व उचित पंचनामा तैयार किया जाता हैं तो विचारण के दौरान न्यायालय में वस्तु को प्रस्तुत करने के बजाए इसका साक्ष्य के रूप में उपयोग किया जा सकेगा। यदि आवश्यक हो तो विस्तार में सम्पत्ति की प्रकृति को वर्णित करते हुए साक्ष्य अभिलिखित की जा सकेगी।
4. साक्ष्य अभिलिखित करने के संबंध में न्यायालय की अधिकारिता न्यायालय के द्वारा शीघ्रता से उपयोग में लाई जानी चाहिए ताकि वस्तु को बिगडऩे की संभावना न रहे।
                                                                 
               सुप्रिम कोर्ट द्वारा विचारण न्यायालय की वैधानिक जिम्मेदारी तय करते हुए तथा जप्त मोटर यान के संबंध में निराकरण की अधिकतम सीमा 6 मास नियत करते हुए यह कहा गया हैं कि जैसी भी स्थिति हो, अभिगृहित माल को लम्बी अवधि तक पुलिस थानों में रखने का कोई प्रायोजन नहीं हैं। मजिस्ट्रेट को उक्त यानों की वापसी के लिए यदि किसी समय अपेक्षित हो, समुचित बंधपत्र और प्रत्याभूति तथा प्रत्याभूति ले ने बाद तत्काल आदेश पारित करना चाहिए। यह ऐसे यानों की वापसी के लिए आवेदन की सुनवाई के लम्बित रहे के दौरान भी किया जा सकता हैं।
          यदि यान का दावा अभियुक्त, स्वामी या बीमा कम्पनी द्वारा या तीसरे पक्षकार द्वारा नहीं किया जाता हैं तो ऐसे यान की नीलामी किये जाने का आदेश न्यायालय द्वारा दिया जा सकेगा। यदि उक्त यान का बीमा, बीमा कम्पनी के साथ बीमित किया गया हैं, तो बीमा कम्पनी को न्यायालय द्वारा यान का कब्जा ग्रहण करने के लिए सूचना दी जायेंगी, जिसका दावा स्वामी या तीसरें व्यक्ति द्वारा नहीं किया जाता। यदि बीमा कंपनी कब्जा ग्रहण करने में असफल रहती हैं, तो यान का विक्रय न्यायालय के निर्देश के अनुसार किया जा सकेगा। न्यायालय ऐसा आदेश न्यायालय के समक्ष उक्त यान को पेश करने की तारीख से 6 मास की अवधी के भीतर पारित करेगा। किसी मामले में यान का कब्जा सौपने के पूर्व उक्त यान का समुचित छायाचित्र लिये जाने चाहिए और ब्यौरेवार पंचनामा तैयार किया जाना चाहिए।

           सम्बद्ध मजिस्ट्रेट यह देखने के लिए तत्काल कार्यवाही करेंगा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 के अधीन शक्तियों का उचित रूप से और तत्परता से प्रयोग किया जाता हैं और सामानों को थानों में लम्बे समय तक, किसी मामले में 15 दिनों से एक मास से अधिक समय तक के लिये नहीं रखा जाता सकता। इस उद्देश्य को भी पूरा किया जा सकता हैं, यदि सम्बद्ध उगा न्यायालय की रजिस्ट्री यह देखने का समुचित सर्वेक्षण हो कि उगा न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों का ऐसा सामानों के सम्बन्ध में समुचित रूप से क्रियान्वयन किया जाता हैं।

          जिला न्यायालय बैतूल के भारत सेन अधिवक्ता का यह सुझाव हैं कि जिले के समस्त पुलिस थानों के प्रभारियों से जप्त सम्पत्ति, मोटर यानों की सूची बुलवाई जाकर थाना प्रभारियों की बैठक जिले के अभियोजन अधिकारियों की मौजूदगी में की जाकर विस्तृत विचार विमर्श कर, संबंधित विचारण न्यायालय से मोटर यानों तथा अन्य जप्त सामानों के निलामी के आदेश प्राप्त करने की दिशा में सुप्रिम कोर्ट के उक्त निर्देशों के तहत म.प्र. शासन की ओर से कार्यवाही प्रारंभ करें। सुप्रिम कोर्ट के उक्त निर्देशों को जिले के समस्त पुलिस थाना प्रभारियों की जानकारी में लाते हुए जप्त सम्पत्ति की समय सीमा 15 दिवस से एक मास तथा मोटर यान के संबंध में अधिकतम 6 मास की समय सीमा निराकरण की तय करने के प्रशासनिक निर्देश जारी करें ताकि पुलिस थानों में लम्बि अवधि तक सम्पत्ति जप्त न रहें।

Posted by jasika lear, Published at 04.06

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