बस बीस रूपए और दरिन्दगी...एक जीवन बर्बाद!!

बस बीस रूपए और दरिन्दगी...एक जीवन बर्बाद!!


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जयपुर। राजधानी में जेएलएन मार्ग स्थित नर्सिग कॉलेज के बाहर फुटपाथ। यहां से गुजरो तो एक लडखड़ाती सी आवाज आ सकती है... साहब वजन तुलवा लो। वेट मशीन लिए एक मासूम अपना पूरा चेहरा तौलिए से ढंक कर बैठा होगा। बेशक वजन तुलवा लो, लेकिन उसका चेहरा देखने की कोशिश नहीं करना, क्योंकि ये चेहरा दरिन्दगी के ऎसे निशानों से भरा हुआ है, जिसे देख कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

ये कहानी है 15 वर्ष के धर्मेन्द्र उर्फ आकाश की। धर्मेन्द्र भी उसी दरिन्दगी भरे एसिड हमले का शिकार हो चुका है, जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने हाल ही सरकारों को आड़े हाथों लिया है। महज 20-25 रूपए प्रतिलीटर के हिसाब से सुलभ इस घातक हथियार से धर्मेन्द्र पर उस समय हमला हुआ, जबकि वह ठीक से चलना और बोलना भी नहीं सीख पाया था। पिछले करीब एक दशक से नरक जैसी जिन्दगी भुगत रहे इस मासूम की क्या गलती थी, जो उसे आज दुनिया से अपना मुंह छिपाना पड़ रहा है।

न देख पाता, न ढंग से बोल पाता। बचपन में खेलकूद नहीं पाया, अब पढ-लिख नहीं सका। बूढे मां-बाप की लाठी बनने लायक भी नहीं। वह और पूरा परिवार दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो गया। मतलब इस सस्ते हथियार ने एक पूरे परिवार की हसती-खेलती जिन्दगी बर्बाद कर दी। पिछले दस-बारह साल में किसी सरकारी नुमाइंदे ने भी इस परिवार की सुध नहीं ली। सुप्रीम कोर्ट के हालिया रूख के बाद राज्य सरकारें इस सस्ते हथियार के प्रति जागने तो लगी हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि ऎसी सैंकड़ों जिन्दगियों को क्या होगा, जो हैवानियत भरे ऎसे एसिड हमलों को झेल कर सड़क पर गुमनाम हो गई।

रात में हुआ हमला, जब मासूम अकेला था

धर्मेन्द्र के पिता बताते हैं कि जमीन के विवाद को लेकर उसके पड़ौसियों ने भी यह हैवानियत भरा कदम उठाया। हिण्डौन सिटी में उनका हंसता खेलता परिवार था। वह खुद खेती करते थे। जनवरी, 2002 की सर्द रात में यह घटना हुई। वह अपने बच्चों को छोड़ कर शहर से बाहर गए हुए थे। इसका फायदा उठा कर विरोधियों ने घर की दीवार तोड़ी और तीन साल के मासूम धर्मेन्द्र और उसकी दो बहनों पर तेजाब की बोतल उंडेल गए।

आज तक कुछ नहीं देख पाया

लरजाई सी आवाज में बोलते धर्मेन्द्र के पिता का कहना है कि हमले के वक्त का उसे कुछ भी ध्यान नहीं। पड़ौसियों ने बताया कि धर्मेन्द्र और उसकी बहनें जोर-जोर से चींख रहे थे। धर्मेन्द्र की दोनों आंखें भी इस हमले में जा चुकी थी। उसके बाद जयपुर के एसएमएस, दिल्ली के सफदरजंग और एम्स जैसे अस्पतालों में उसे दिखा कर लाखों रूपए ईलाज पर खर्च कर लिए, लेकिन कोई फायदा नहीं। धर्मेन्द्र आज तक कुछ नहीं देख पाया है।

सड़क पर रात बिताने को मजबूर

ईलाज और मुकदमों में पैसा खर्च कर धर्मेन्द्र के परिवार के पास अब कुछ नहीं बचा। अब यह परिवार फुटपाथ पर मजदूर और गरीब तबके के लोगों के लिए एक सड़कछाप ढ़ाबा चलाता है। रात को इसी ढ़ाबे के पास टूटे फूटे सामान को तिरपाल में ढंक कर एक आशियाना बना लिया है। वजन तोलने की मशीन से एक-आध रूपए धर्मेन्द्र कमाता है और यहीं ुजर-बसर का साधन है।

रात को चींख पड़ता है.... मासूम

धर्मेन्द्र को उस रात मिले जख्म तो अब भर गए हैं, लेकिन डर उस मासूम के मन पर अब भी हावी है। कई बार रात को डर कर वह चींख कर उठ जाता है। धर्मेन्द्र के पिता का कहना है कि उन्होंने हिण्डौन में मुकदमा तो दर्ज कराया था,लेकिन विरोधियों के डर से धर्मेन्द्र अब तारीख-पेशी पर भी नहीं जाता। उन्होंने भी अब कानूनी कार्रवाई की ओर ध्यान देना छोड़ दिया है।

एसिड हमले और हालिया कहानी

दिल्ली गैंगरेप के बाद संसद ने एसिड हमले को को भारतीय दंड संहिता की अलग धारा के तहत परिभाषित कर दिया। इसमें न्यूनतम दस साल और अधिकतम उम्र्रकैद तक का प्रावधान है। हाल ही 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर देश में एसिड की बिक्री के नियमन का आदेश पारित किया है।

इसकी पालना में मध्यप्रदेश पहला ऎसा राज्य बना है, जिसने तीन अगस्त को अपने यहां बिना लायसेंस के एसिड बिक्री को पूरे राज्य में प्रतिबंधित कर दिया है। दुकानदारों को वहां एसिड बिक्री का पूरा लेखा-जोखा भी रखना होगा। ऎसा नहीं होने पर तीन माह जेल और 50 हजार रूपए जुर्माने का प्रावधान किया गया है। भारत से पहले बांग्लादेश, युगान्डा और कम्बोडिया अपने यहां एसिड अटैक के खिलाफ कानून बना चुके हैं।

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Posted by jasika lear, Published at 06.41

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