उनका कहना था कि फोन कॉल्स के अलावा एस.एम.एस. (संदेश) के जरिए शुभकामनाएँ इतनी मिलीं कि उन्हें बैंक में जमा कर दे, लेकिन होली के दिन बैंक की बन्दी होने की वजह से वह ऐसा नहीं कर सके। उनके अनुसार जितने संदेश आए उनमें जान-पहचान हित-मित्रों की संख्या कुछ प्रतिशत ही थी, ज्यादातर ऐसे एस.एम.एस. होली विशेज (होली की शुभकामनाओं) के आए, जिनके नम्बर सेव न होने के कारण समझ में नहीं आया कि वे किसके हैं, और कौन से ऐसे शुभचिन्तक हैं जो बिन माँगे ही ढेरों शुभकामनाएँ दे डाल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि ‘शुभकामना’ भेजने वाले कथित शुभचिन्तक कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने संदेश के नीचे अपना नाम व पता भी लिखा था और अधिकाँश ऐसे थे जिनके संदेशों में नाम नहीं लिखा था वे गुप्त शुभाकाँक्षी रहे होंगे। हालाँकि उन्होंने यह दावा किया कि होली में अनचाहे शुभकामना संदेश प्रेषकों को रिप्लाई दिया, लेकिन अब यह नहीं मालूम कि वह किसे मिला...? मैंने पहले सोचा कि वह डींगे मारकर अपने स्टेटस का बखान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि होली का पूरा दिन एस.एम.एस./फोन काल्स अटेण्ड करते बीता। उनके इस कथन में दुःख परिलक्षित हो रहा था तब मुझे यहसास हुआ कि उनकी होली का रंग मोबाइल और लैण्ड लाइन फोन ने बदरंग कर दिया था। मुझे बेहद तसल्ली हुई कि कम से कम मैं बचा रहा वर्ना मैं भी उनकी तरह पूरा दिन फोनियाता रहता न कि होलियाता...?
होली का दिन आ गया था। मेरे मोबाइल और लैण्ड लाइन पर जब कोई फोन/एस.एम.एस. नहीं आया किसी ने मुझे शुभकामना संदेश नहीं भेजा तो मेरा भेजा खराब होने लगा, मुझसे रहा नहीं गया। दिमाग की नसें फटने के लिए उतावली हो रही थीं, तभी सुलेमान भाई आ गए। वह बोले अमाँ मियाँ महँगाई की वजह से इस बार की होली एकदम से फीकी है, आज वह अपने हाथों में पैकेट लिए थे। मैंने कहा डियर इस डिब्बे में क्या है? वह बोले यार घर से निकला तो राम भरोस चाय वाले के यहाँ गया, उसकी दुकान बाहर से बन्द थी, लेकिन अन्दर ताजे समोसे, गुझिया, लड्डू रखे हुए थे। जब उसने मुझे देखा तभी जान गया तो इस डिब्बे में होली पकवान रख दिया बोला मेरी तरफ से भी कलमघसीट को होली की शुभकामना कह दीजिएगा।
मैं एस.एम.एस. मोबाइल और अन्य बातों को भूलकर सुलेमान के हाथों से डिब्बा खींच लिया फिर उसे खोला। थोड़ी देर में हम दोनों यार राम भरोस का होली पकवान उदरस्थ कर लिया। डकार भी खूब आई। जी भर कर खाए और पानी पिया। फिर बैठकर एक दूसरे की बाते शेयर करने लगे। इस बार की ‘होली’ पर काफी ‘सुकून’ मिला, इस होली पर हम गरीबों की आत्मीयता ने सबकी भारी भरकम होली को मात दे दिया था।
-भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
(लेखक अकबरपुर अम्बेडकरनगर (उ.प्र.) के निवासी, वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Posted by , Published at 03.11

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